Monday, October 20, 2008

धूप

सूरज की टोकरी से जैसे स्वर्ण भस्म की एक पुड़िया गिरी, खुली और आसमान के आँचल पर बिखर गई |

चारों तरफ़ एक स्वर्णिम जाला फैल गया |

मैं सो रही थी चादर मुंह पर से हटाए,
नींद में मेरी आंखों पर चौंध गई और मुझे जगा कर मानो खुशी से नाच उठी हो |

मैंने जब गुस्से से बाहर देखा तो उसका मुस्कुराता हुआ चेहरा देखकर मन में एक अनुभूति हुई|

ऐसी अनुभूति जो उस नए दिन का स्वागत करने को कहती थी,
एक नई, ताज़ी और स्वच्छ बेला में खो जाने को कहती थी |

एक अनुभूति जो उस बेला के आलोकिक एवं अद्वैत वातावरण से परिचित कराती है |

धूप के इसी रूप और स्वरुप के अनुरूप मेरा दिन बीता करता है... ...

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