कभी सोचा है? सूखे पत्ते जैसी होती जायेगी यह ज़िन्दगी |
अभी तो इसमें जान है, हरी दिखती है यह ,
पर जैसे किताब में रखे पत्ते सूख जाते हैं,
अपना पानी, हरिमा और सौंदर्य खोकर मानो रुक से जाते हैं ,
उसी वक्त में जिसे वे कभी खोना नही चाहते|
मैं भी नहीं चाहती,की यह दिन खो जाएँ|
रोक लोना चाहती हूँ और सहेज के रखना चाहती हूँ इन्हें ...
सूखे पत्तों की तरह|
बना लुंगी मैं अपनी स्मृतियों को सूखे पत्ते|
ताकि जब खोलके देखूं कभी, तो
इन दिनों की यादों, खुशियों, भावनाओं और परिस्थितियों का
एक चित्र सा बन जाए आंखों में और मैं भी ये सोचूं कि
इन सूखे पत्तों में भी कभी पानी था, जान थी, हरिमा थी और
कितने सुंदर और जीवित थे वे दिन... ... ...
एक चित्र सा बन जाए आंखों में
इन सूखे पत्तों में भी कभी पानी था, जान थी, हरिमा थी और
कितने सुंदर और जीवित थे वे दिन... ... ...
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